Monday, 31 August 2015
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युगों ने बदला ब्रह्माण्ड का स्वरूप सदियों ने तय किया इंसान का रूप परन्तु मैं वहीं हूँ जहां कालांतर में ...
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पड़ जाये रंग थोडा फीका नीले आसमान का हो जाये मंद गति तेज चलती हवाओं की थोडा समंदर भी सूख जाये एक टुकड़ा चाँद का भी टूट जाये ...
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बहती हवाओं के मध्य खड़ी अस्थिर अनवरत प्रतीक्षा है आकाश ठहरा बादल एक नाव मेंहदी से सुर...

भावपूर्ण रचना ..
ReplyDeleteमुझे बहुत पसंद हैं रचना .. सुन्दर हैं
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ReplyDeleteजय मां हाटेशवरी...
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 28/10/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...
जीवन सरल नहीं काँटों की राह से कमतर नहीं ..
ReplyDeleteबहुत सुन्दर