Tuesday, 10 October 2017

हाँ तुम रहो...









                               




बहती हवाओं के मध्य
खड़ी
अस्थिर
अनवरत प्रतीक्षा है
आकाश
ठहरा बादल
एक नाव

मेंहदी से सुर्ख हाथ
( वो हाथ मेरे )
दूब घास जो पीली होकर नीली काली हो गयी
कोई हृदय भी नहीं बचा
किसी हृदय के लिए
ममत्व के लिए
मोह
मौन सत्य के लिए

मगर तुम रहो
ब्रह्माण्ड के सर्वस्व ज्ञाता
सूरज
 चंद्र
 तारे बनकर

हाँ तुम रहो
किसी डाल पर बसंत के जैसे
खिलो इसी ऋतु में
इस युग का ऋण चुकाने के लिए
करो सारे जतन
सबसे प्रेम करने के लिए
बनो परमात्मा
संत कबीर

या फिर सफ़ेद नन्हा फूल
जो उगेगा बरसात की गीली मिटटी में
उस अमर सौन्दर्य की कल्पना करते हुए
तुम श्वास भरो
तुम रहो

प्रतीक्षा की सारी घड़ियां बीनते हुए
हाँ तुम रहो...








1 comment:

  1. शब्द शब्द गहरे भाव जगाती आपकी रचना अप्रतिम है

    ReplyDelete

हाँ तुम रहो...

                                बहती हवाओं के मध्य खड़ी अस्थिर अनवरत प्रतीक्षा है आकाश ठहरा बादल एक नाव मेंहदी से सुर...