Wednesday, 4 December 2013

तेरे मिलने के बाद...








जज्बातों को रौदां है बहुत अपने
तब जाकर जिंदगी तेरे पहलु तक आये हैं

है उम्मीद इन जलते चिरागों से बहुत
जो रौशनी में इतने झिलमिलाये हैं


गुलिस्तां के फूलों के रंग इतने सुर्ख न थे
जितने की तेरे मिलने के बाद हो आये हैं

होश अपने मखमली एहसासों के रख छोड़े
जो तूने अपने बेगानों के बीच कराये हैं

मुट्ठी भर रेत जो हवाओं में घुलने लगी
सरकते वक्त से कुछ पल हमने बचाये हैं

कोशिशें तमाम यूँ ही जारी है तैरने की
गहरे समंदर में जब से गोते लगाये हैं

बीती जिंदगी का फिछले सिर खोला हमने
कुछ दबे राज ऐसे भी उभर कर आये हैं

गहराता जाता है अँधेरा चारों तरफ
अश्कों में डूबे लब्ज जब से स्याह हो आये हैं

कमी कोई नहीं है देख लो फिर भी मगर
मांगने को बन के फकीर तेरे दर पर आये हैं

दो लिख रही हूं

तुम जानते हो  दोधारी तलवार पर चलना क्या होता है शायद नहीं जानते  मेरे पास बेबुनियादी बातों का ढेर नहीं है  बल्कि ह...