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युगों ने बदला ब्रह्माण्ड का स्वरूप सदियों ने तय किया इंसान का रूप परन्तु मैं वहीं हूँ जहां कालांतर में ...
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पड़ जाये रंग थोडा फीका नीले आसमान का हो जाये मंद गति तेज चलती हवाओं की थोडा समंदर भी सूख जाये एक टुकड़ा चाँद का भी टूट जाये ...
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ये धुंधले आशियाने कुछ कहते हैं हम आज भी बीते हुए कल में रहते हैं कुछ बातें अधूरी सी वो शामें सिन्दूरी सी यादों के शामियाने ...
