कलम..

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Sunday, 9 August 2015

जूते नहीं जानते







जूते नहीं जानते  
रास्ता अपने घर का 
जंगल का 
दुनिया का

वे जानते हैं सिर्फ पता 
वे घर परिवार में रहते हैं
दुनिया में और युद्ध के मैदान में भी

किसी सेवक की तरह 
अछूत की तरह 
गुलाम की तरह

वे किसी फिसलन से नहीं घबराते
ना ऐंठते हैं  
घबराये हुए लोग नाक ऊंची किये चलते हैं
कुछ कुछ ऐंठते हुए 

उन्हें दिशाभ्रम नहीं होता
अज्ञान नहीं छूता   
अहं की प्रवृति से दूर 

वो रहते हैं मिटटी से सने 
सदा ठोकरों में   


3 comments:

  1. वाह वाह ...बहुत सुन्दरता से बयां कर दिया समर्पण ...और पाठक को विवश कर दिया सोचने को

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  2. जज्बातों को सुन्दर अल्फाजों से सजाया है.....बहुत खूब...

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