कलम..

कलम..

Tuesday, 8 April 2014

तुम आये हो तो मैं आती हूँ









तुम आये हो तो मैं आती हूँ
राज कुछ दिल के समझाती हूँ

इन बंद दरवाजों की जंजीरों को खोल दूं जरा 
इन चंद दीवारों का दामन छोड़ दूं ज़रा 
दर्द  के कितने किस्से आकर सुनाती हूँ 
कौन दुःख आया मेरे हिस्से सब बतलाती हूँ

गम में डूबा रहा रात भर उस दिल को निचोड़ लूं ज़रा 
पुर्जा पुर्जा हो गयी उस तस्वीर को जोड़ लूं ज़रा 
कुछ पुराने जख्म तुम्हें दिखलाती हूँ 
साथ अपने कोई मरहम ले आती हूँ

मृत शय्या पर जो पड़ी रही उसको कफ़न ओढ़ दूं ज़रा 
तनहा आँगन में खड़ी रही उसे वापिस मोड़ दूं ज़रा 
तन्हाई को दूर कहीं छोड़ आती हूँ 
परछाई के पीछे दौड़ आती हूँ 

बंद पड़ी दिवार घडी की सुइयों को छेड़ दूं ज़रा 
चिथड़ों में लिपटे लिबास को उधेड़ दूं ज़रा 
सुप्त मन की तृष्णा को जगा आती हूँ 
अनसुलझी पहेली को सुलझा आती हूँ 

खण्डर बन चुकी इस हवेली से विदा तो हो लूं ज़रा 
दुल्हन बन आयी थी नवेली बहा लूं दो आंसूं ज़रा 
एक कहानी कुछ बातें दफना आती हूँ 
कागज पर लिखी यादें  जला आती हूँ

तुम आये हो तो मैं आती हूँ