Saturday, 8 June 2013

इन आँखों को भी भीग जाने दे


महरूम कर गम से हमें ,
बस इतनी सी शिकायत है, 
जैसे हवा में घुलती है खुशबू, 
तमाम उमर यूँ ही गुजर जाने दे |
तेरे प्यार का मरहम ,
झेल पाएगें हम,
बरसता है सावन जैसे ,
इन आँखों को भी भीग जाने दे |
आखिरी मोड़ पर जो खड़ी हुई ,
जिंदगी इक सवाल ही रही, 
लो थम  गयी है रात ,
अब इन साँसों को भी थम जाने दे |
तेरे दर से और कहीं ,
क्या ले जाएँ हम,
अरमानों का था जो आइना,
उसको भी टूट जाने दे |
कदम खुदबखुद रुक गए, 
वो राह  कहीं खो गयी ,
था सफ़र जिसका बाकी ,
उस मंजिल को अब छूट जाने दे |

5 comments:

  1. सार्थक ब्लॉग तथा सुंदर रचनाएं, बधाई और शुभकामनाएं

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    1. आपका बहुत बहुत आभार ब्यक्त करती हूँ कि आपने मेरे लेखन को इस काबिल समझा, आशा करती हूँ आगे भी आप मेरा हौसला यूँ ही बढ़ाएगें....

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  2. मंजूषा जी ..एक अद्भुत समपर्ण की तरफ इशारा करती शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई ..सादर

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    1. आपकी दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ , कि आपने मुझे इस काबिल समझा

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  3. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है। मंजूषा जी

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