Saturday, 26 October 2013

लक्ष्मण रेखा







र्यादा के वृत्त में खड़ा कर औरत
सदियों से जिंदगी को जबरन ढोती

आज की सीता है तुमसे पूछ रही 
क्यों पुरुषों की लक्ष्मण रेखा नहीं होती

फूल दूसरों के बिछौने में बिछा खुद 
काँटों की सेज पर चारों पहर सोती

अयाशियों के दल दल से बाहर निकाल 
अश्रुओं से पति का मैला दामन धोती

हर अंग जकड़ा हुआ है बेड़ियों में
समझती जैसे उन्हें बसरा का मोती

हर बार जीतते जीतते जंग हार जाती 
दर्द के समंदर में अपने अरमान डुबोती

ढलती साँझ में उम्मीद की लौ जला कर
उसकी रौशनी में सब आशाएं खोती 

बरसों की दहलीज पर जमी मिटटी को
गमले में रख अपने सपनों के बीज बोती

अपने कर्तव्यों का दायित्व निभाते हुए कब 
एक आंख हस देती एक आंख उसकी रोती


22 comments:

  1. purushon ki laksham rekha :)
    sundar shabd chitran...

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  2. आपके ब्लॉग को ब्लॉग - चिठ्ठा में शामिल किया गया है, एक बार अवश्य पधारें। सादर …. आभार।।

    नई चिठ्ठी : चिठ्ठाकार वार्ता - 1 : लिखने से पढ़ने में रुचि बढ़ी है, घटनाओं को देखने का दृष्टिकोण वृहद हुआ है - प्रवीण पाण्डेय

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    1. हार्दिक आभार..आपका

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  3. बरसों की दलहिज पर जमीं मिटटी को
    गमलों में रखकर अपने सपनों के बीज बोती
    बिल्कुल सही.... बहुत खुबसूरत रचना ....

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  4. रसों की दलहिज पर जमीं मिटटी को
    गमलों में रखकर अपने सपनों के बीज बोती
    .... बहुत खुबसूरत रचना !

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  5. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन गणेश शंकर विद्यार्थी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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    1. हार्दिक आभार हर्षवर्धन जी..आपका इस सम्मान हेतु

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  6. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (27-10-2013) के चर्चामंच - 1411 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    1. हार्दिक आभार अरुण जी..आपका इस सम्मान हेतु

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  7. नारी जीवन का सुन्दर चित्रण |
    नई पोस्ट सपना और मैं (नायिका )

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  8. कमाल की रचना है , बार बार पढने योग्य , बधाई !

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    1. हार्दिक आभार सतीश जी जी..आपका इस सम्मान हेतु

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति


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  10. अदभुत , सुंदर, लेखनी का जादू , शुभकामनाये मंजूषा जी

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  11. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  12. बहुत अच्छी प्रस्तुति...दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@जब भी जली है बहू जली है

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  13. एक बेहतरीन कृति / बहुत ही सुन्दर रचना
    अल्फ़ाज़ साथ नहीं दे रहे तारीफ़ करने में , सिर्फ और सिर्फ बहुत ख़ूब ही कह पा रहा हूँ।
    बहुत बहुत बधाई

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  14. आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (13-04-2014) को ''जागरूक हैं, फिर इतना ज़ुल्म क्यों ?'' (चर्चा मंच-1581) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर…

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    1. हार्दिक आभार ..अभिषेक जी..इस सम्मान हेतु

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  15. नारी जीवन की व्यथा कथा को बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है आपने ! अत्यंत प्रभावशाली रचना !

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  16. nari jiwan ki kahaani yahi hai .. sundar prastuti badhayi shubhkamnaye :)

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