कलम..

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Saturday, 9 May 2015

जो आदि है वही अंत है








हाल ही में उजड़े हैं कुछ लोग 
हर बार उजड़ते हैं 
कितने ही कारणों से 

पानी से 
मिटटी से 
आग से 
हवा से 
और मैं देखती हूं 

उन्हें उजड़ते हुए  
जीवन से मौत में तब्दील होते 
अचरज होता है 

जहाँ जीवन है वही मौत है 
यही सब मेरे आसपास है
मेरे जीवन के स्रोत भी यही हैं

आग हवा मिटटी और पानी है   
एक वृत्त बना है मेरे चारों तरफ 
इस पर विश्वास करना बेहद मुश्किल है 

कि ये उजड़ापन कभी न कभी मुझ तक भी पहुंचेगा 
जो आदि है वही अंत है 

2 comments:

  1. हरेक को वहीं पहुंचना है जहाँ से वह आया है...देर सबेर..

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  2. सच में जहाँ आदि है वहां अंत भी अवश्य होगा

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